संत रविदास के दोहे और कहावतें, ऐसे समाई कठौती में गंगा

संत रविदास के दोहे और कहावतें, ऐसे समाई कठौती में गंगा 1

संत रविदास के दोहे और कहावतें, ऐसे समाई कठौती में गंगा

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सामाजिक जीवन में जाति व्यवस्था के अनुसार, निम्न जाति समझी जानेवाली जाति में जन्में संत रविदास को उनके विचारों और शब्दों ने दूर-दूर तक ख्याति दिला दी। बड़े-बड़े साधु-संत, महात्मा यहां तक कि राजा-महाराज भी उनकी विद्वता से प्रभावित थे। अपनी कठौती से सोने का कड़ा निकाल देनेवाले संत रविदास को कभी भी धन और माया का मोह नहीं रहा। आइए, आज उनके दोहों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। ताकि हम भी जीवन में कुछ बेहतर कर सकें…

गुण ही सर्वोपरि

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ब्राह्मण मत पूजिए जो होवे गुणहीन,
पूजिए चरण चंडाल के जो होने गुण प्रवीन।।

इस दोहे में रविदास जी कहते हैं कि किसी को सिर्फ इसलिए नहीं पूजना चाहिए क्योंकि वह किसी पूजनीय पद पर बैठा है। यदि व्यक्ति में उस पद के योग्य गुण नहीं हैं तो उसे नहीं पूजना चाहिए। इसकी जगह अगर कोई ऐसा व्यक्ति है, जो किसी ऊंचे पद पर तो नहीं है लेकिन बहुत गुणवान है तो उसका पूजन अवश्य करना चाहिए।

मन की पवित्रता

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मन ही पूजा मन ही धूप, मन ही सेऊं सहज स्वरूप।।

इस पंक्ति में रविदासजी कहते हैं कि निर्मल मन में ही भगवान वास करते हैं। अगर आपके मन में किसी के प्रति बैर भाव नहीं है, कोई लालच या द्वेष नहीं है तो आपका मन ही भगवान का मंदिर, दीपक और धूप है। ऐसे पवित्र विचारों वाले मन में प्रभु सदैव निवास करते हैं।

कर्म का फल

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रविदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच
नकर कूं नीच करि डारी है, ओछे करम की कीच

इस दोहे में रविदासजी कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति किसी जाति में जन्म के कारण नीचा या छोटा नहीं होता है। किसी व्यक्ति को निम्न उसके कर्म बनाते हैं। इसलिए हमें सदैव अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए। हमारे कर्म सदैव ऊंचें होने चाहिए।

कठौती में गंगा

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‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’

संत रविदास की यह कहावत बहुत ही प्रसिद्ध है। इस कहावत के जरिए एक बार फिर रविदास जी मन की पवित्रता पर जोर देते हैं। रविदास कहते हैं, जिस व्यक्ति का मन पवित्र होता है, उसके बुलाने पर मां गंगा एक कठौती में भी आ जाती हैं।

न क्रोध आए न काम

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रैदास कहै जाकै हदै, रहे रैन दिन राम
सो भगता भगवंत सम, क्रोध न व्यापै काम।।

इस दोहे में संत रविदास भक्ति की शक्ति का वर्णन करते हैं। रैदासजी कहते हैं, जिस हृदय में दिन-रात बस राम के नाम का ही वास रहता है, ऐसा भक्त स्वयं राम के समान हो ता है। राम नाम की ऐसी माया है कि इसे दिन-रात जपनेवाले साधक को न तो किसी के क्रोध से क्रोध आता है और न ही कभी कामभावना उस पर हावी होती है।

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